महापौर – पार्षद प्रत्याशियों की घोषणा करने में भाजपा रही अव्वल लेकिन भीतरी असंतोष की वजह से गहराया संकट….

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News By – विवेक चौधरी

रतलाम। वैसे तो प्रदेश में पहले पंचायत और उसके बाद नगरीय निकाय का चुनाव सम्पन्न होने जा रहे है लेकिन शहरी और प्रबुद्ध वर्ग से जुड़े होने की वजह से नगर सरकार के चुनाव ही चर्चा का विषय बन रहे है। अब पार्टी के प्रत्याशियों के चयन की बातें ‘चौराहो की चर्चा’ का प्रमुख विषय बनने लगी है। रतलाम शहर की चुनावी चर्चाओं की बात करें तो राजनीति में रुचि रखने वालों के जुबान पर यही चर्चा है कि महापौर और पार्षद प्रत्याशियों के चयन में तो भाजपा ने बाजी मार ली है लेकिन इसके साइड इफ़ेक्ट में भाजपा को कार्यकर्ताओं का असंतोष मिला है। सर्वे और अटकलों में भाजपा महापौर उम्मीदवार के रूप में अशोक पोरवाल दौड़ में आगे थे लेकिन नगर विधायक चैतन्य कश्यप के वीटो की वजह से भाजपा ने टिकट प्रहलाद पटेल को दे दिया। पैनल और दौड़ में नाम होने की वजह से पिछली बार के पार्षद प्रहलाद पटेल का नाम तय करवाना नगर विधायक के लिए आसान रहा। लेकिन पार्षद प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद भाजपा में असंतोष के स्वर उठने लगे। पहले सोशल मीडिया के ग्रुप्स में स्थानीय भाजपा नेताओं के तल्ख स्वर से और बाद में पटरी पार की तेजतर्रार महिला नेत्री सीमा टांक के दलबल के साथ जाकर विधायक कार्यालय पर बहस और भजन करने से असंतोष छुपा हुआ नहीं रह गया। पूर्व पार्षद सीमा टांक को इस बार भाजपा ने पार्षद का टिकट नहीं दिया है। उन्होंने अपने क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के साथ आकर शहर विधायक कार्यालय पर आक्रोश व्यक्त किया। वंशवाद और अपनों को रेवड़ी बांटने के आरोप लगाए। भाजपा महापौर प्रत्याशी प्रहलाद पटेल और सीमा टांक का कार्यक्षेत्र एक ही है। ऐसे में इस क्षेत्र के वोटों के आँकड़े हार जीत भले ना तय कर पाए लेकिन कहीं जीत का जश्न फीका ना कर दे इसकी चिंता पार्टी हो होने लगी है।

शहर विधायक कश्यप के प्रति यह असंतोष पार्टी में पहली बार देखा जा रहा है। पार्षद उम्मीदवारों की सूची भी कम चोंकाने वाली नहीं है। इसमें कई दिग्गजों के नाम काटे गए है वहीं कई के परिवारजनों को उपकृत किया गया है। इससे आने वाले समय में बागी निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या बढ़ सकती है। यद्धपि शहर विधायक ने पूर्व विधायक हिम्मत कोठारी को खुशनुमा माहौल में  मिठाई खिलाकर इस बात का संकेत दिया है कि अभी भी बागडोर उनके ही हाथों में है। भाजपा की समस्या यह भी है कि उससे जुड़े लोग यह समझ रहें है कि इस बार भाजपा को ‘वाक ओवर’ मिलने की स्थिति है। इसलिए हर कोई भाजपा से टिकट पाने की जद्दोजहद में है। जहाँ कुछ योग्य होकर भी टिकट पाने से वंचित रह गए है वहीं कुछ अपने सरपरस्तों की वजह से ड्राइविंग सीट पर सवार हो गए है। अब देखना यह है कि नामांकन की समय सीमा नज़दीक आ गई है और काँग्रेस के महापौर एवं पार्षद प्रत्याशियों की घोषणा होना अभी भी बाकी है। घोषणा में तो काँग्रेस पिछड़ गई है लेकिन उनकी सूची आने के बाद ही तय होगा कि भाजपा का संकट टला है या नहीं।


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