निजी अस्पताल का तो पंजीयन हुआ निरस्त, लेकिन शासकीय चिकित्सको के क्या है हाल?

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News By – नीरज बरमेचा 

• सीएचएल जैन दिवाकर अस्पताल का पंजीयन निरस्त
• शासकीय जिला चिकित्सालय & शासकीय मेडिकल कॉलेज का हाल है, बेहाल
• नियमो को ताक पर रख खुले आम कर रहे है निजी प्रैक्टिस

रतलाम। गुरुवार को रतलाम जिले में नर्सिंग होम एक्ट के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने के संबंध में कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम के निर्देश पर दल ने निरीक्षण के दौरान सीएचएल अस्पताल में एक भी रेजीडेंट चिकित्सक उपस्थित नहीं पाए जाने पर विभाग द्वारा कार्यवाही करते हुए संस्था का नर्सिंग होम एक्ट अंतर्गत पंजीयन निरस्त किया गया है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रशासन ने कभी जिला चिकित्सालय एवं शासकीय मेडिकल कॉलेज की सुध ली है? शायद नहीं! क्योकि जितनी लापरवाही यहाँ चल रही है शायद वो नहीं होती| और ऐसे में सभी आला अधिकारी देखकर भी अनदेखी करने में लगे हुए है| और इसमें नुकसान तो आम जनता का ही हो रहा है|


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एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के अनुसार मेडिकल कॉलेज में डेंगू से अब तक 36 की मौत हो चुकी है और पुष्टि मात्र 5 लोगो की की गई है | कोरोना से हुई मौतों के आँकड़े पर भी सवालिया निशान लगाए जा रहे है। यह भी हो सकता है कि पेपर पर यह आँकड़ा कम हो, लेकिन सच्चाई दिल दहला देने वाली निकले?

फिर भी नहीं संभल रहे है शासकीय चिकित्सक…

रतलाम शासकीय मेडिकल में कुछ ही चिकित्सको को छोड़ दे तो बाकी कई सारे चिकित्सक सुबह से अपनी गाड़ी उठा कर निजी प्रैक्टिस के लिए निकल पड़ते है। कितनी आराम की है ऐसे चिकित्सको की जिंदगी? तनख्वाह सरकार से लेना, मकान सरकारी, लेकिन काम निजी? पिछले कुछ दिनों से शहर का कुछ अजीब सा ही सिस्टम बना हुआ है, इस मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों का। ना तो कोई आला अधिकारी इस और अपनी प्रतिक्रिया देते है और ना ही जनप्रतिनिधि।

नियमो को ताक पर रख कर अनेक चिकित्सक निजी हॉस्पिटल, निजी क्लिनिक पर सुबह से लेकर शाम तक लगे हुए है। यहाँ तक कि अब तो पैथोलॉजिस्ट भी शहर में पैथोलॉजी खोल कर खुले आम डंके की चौट पर सुबह से लेकर शाम तक रिपोर्ट दे रहे है। कितनी आसानी से कागदी कार्यवाह कर प्रशासन को गुमराह किया जा रहा है?

यह हालत सिर्फ मेडिकल कॉलेज के ही नही बल्कि जिला चिकित्सालय के भी है। किसी के निजी हॉस्पिटल चल रहे है तो किसी के नाम पर पैथोलॉजी लैब। और खुलेआम अधिकारियो की आँखों में धूल झोंककर यह एक वृहद व्यापार का रूप ले चूका है|

ऐसे में कुछ ही दिनों में सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल की शुरुआत रतलाम शासकीय मेडिकल कॉलेज में होने जा रही है और वहाँ के कई चिकित्सक पहले से ही अपनी निजी अस्पतालों की सेटिंग कर चुके है| बहुत जल्द इसके भी नतीजे आना शुरू हो जायेंगे| लेकिन इन सब के बीच मरता आम आदमी ही है। जिनके जैक जरिया है, आर्थिक रूप से सक्षम है, वो तो अपनी व्यवस्था कर लेंगे। लेकिन आम आदमी शासकीय चिकित्सा संस्थानों में चिकित्सकों को ढूंढते ही रह जायेगा। मरीजों की उचित उपचार के अभाव में बुरी हालत हो जाएगी। यह एक आम सी बात हो गयी है और इसे एक सिस्टम सा बना लिया गया है। बड़ा प्रश्न तो यह है कि क्या गरीब आदमी को जीने का कोई हक ही नहीं है क्या? और तो और इतना कुछ होने के बाद भी जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी से लेकर जनप्रतिनिधिगण सब चुप्पी साधे बैठे है। कब जागेंगे जवाबदार लोग???


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