News by – नीरज बरमेचा
भारत वर्ष को पराधिनता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए लड़ाई कब शुरू हुई ये ठीक से बताना कठीन हैं कई ज्ञात-अज्ञात लोगों ने इस लड़ाई में वैचारिक अलख जगाई ।
“गोस्वामी तुलसीदास ने जब ‘पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ का उद्घोष किया तो उनके मानस में देश को स्वतंत्र कराने की ही कामना रही होगी, उन जैसे संतों ने ही हमारे अंदर स्वाभिमान की चिंगारी पैदा की, जो आगे चलकर स्वतंत्रता व स्वराज की ज्वाला बन कर प्रदिप्त हुई|
भारत को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष हो गये इस अवसर पर भारत सरकार व राष्ट्रवादी संगठनों ने 15अगस्त 1923 तक “स्वराज का अमृत महोत्सव” मनाने का तय किया और यह विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया भी जा रहा है।स्वराज का अमृत महोत्सव के अंतर्गत शनिवार को स्टेशन रोड़ स्थित उजाला पैलेस में अधिवक्ता गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में लालचंद उबी एवं तेजराम माँगरोदा रहे वहीं अध्यक्षता अभय शर्मा की रही। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में पुष्यमित्र भार्गव रहे। आपने अपने उद्बोधन में कहा कि हम उस परंपरा का निर्वहन कर रहे जिसमें लाल बहादुर शास्त्री एवं बाल गंगाधर तिलक जैसे अधिवक्ताओं का सहयोग एवं बलिदान भी सम्मिलित है। आपने हिंदी पर भी जोर देते हुए कहा कि हमे हस्ताक्षर हिंदी मे ही करना चाहिए साथ ही आमंत्रण पत्र व विजिटिंग कार्ड भी हिंदी में छपवाए। अनुच्छेद 348 का ब्योरा देते हुए आपने बताया कि कोर्ट से भी अंग्रेजी पूर्ण रूप से हटानी चाहिए, ताकि अंग्रेजी की गुलामी से हमे पूर्ण रूप से छुटकारा मिले।
मंच संचालन प्रतीक गौतम ने किया व कार्यक्रम का समापन वंदेमातरम गीत से हुआ जिसे सुनीता छाजेड़ एवं कल्पना काले द्वारा गाया गया। अंत मे आभार सुरेश वर्मा ने माना ।

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