निजी प्रैक्टिस के चलते शासकीय मेडिकल कॉलेज के एक चिकित्सक को देना पड़ा इस्तीफा, जानिए क्या है पूरा मामला…..

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News By – नीरज बरमेचा

निजी प्रैक्टिस को लेकर रतलाम शासकीय मेडिकल कॉलेज हमेशा ही चर्चा कर रहा है, ऐसे में एक चिकित्सक डॉ रौनक जैन को रतलाम शासकीय मेडिकल कॉलेज की नौकरी से हाथ धोना पड़ जाता, लेकिन डीन ने अभी इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं किया है और जाँच बैठा दी है। रतलाम कलेक्टर को शिकायत प्राप्त होने पर डॉ. जैन पर तुरंत कार्यवाही की है।

ऐसे कई चिकित्सक है जो शासकीय जिला अस्पताल एवं शासकीय मेडिकल कॉलेज में पदस्थ हैं लेकिन शासकीय नौकरी होने के बावजूद सभी अपनी अपनी निजी प्रैक्टिस में अधिक रुचि रखते हैं। सिर्फ कुछ चिकित्सकों को छोड़ दिया जाए तो अन्य शासकीय अस्पतालों में कम और निजी अस्पतालों में ज्यादा समय एवं ज्यादा रुचि से कार्य कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि इसमें उनके निजी हित निहित हैं। इस और पूर्व में शासकीय मेडिकल कॉलेज के डीन रहे डॉ संजय दीक्षित ने भी कई चिकित्सकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था, लेकिन कई चिकित्सको ने उन्हें बहुत हल्के में ले लिया। और उसका असर नहीं हुआ था।

चिकित्सक खुल कर निजी प्रैक्टिस कर रहे है, खुल कर बेवजह सरकार का खजाना खाली करने में लगे हुए है| कुछ चिकित्सक सरकार का खजाना भी खाली कर रहे हैं और ईमानदारी से काम भी नहीं कर रहे हैं। वे निजी प्रैक्टिस में अपना तन मन लगा रहे हैं। स्वाभाविक है कि उनका लक्ष्य बड़ी मात्रा में धन अर्जन करना है।

यह आला अधिकारिओ द्वारा उठाया गया एक सराहनीय कदम है, लेकिन कलेक्टर गोपाल चन्द्र डाड एवं रतलाम शासकीय मेडिकल कॉलेज की डीन डॉ शशि गांधी को आगे भी ऐसे ही और भी कठोर एवं सख्त कदम उठाने होंगे, जिससे रतलाम में आने वाली शासकीय सुविधाओं का लाभ एक आम इंसान चैन से ले सके।

मुँह दिखाई की रस्म करते है कुछ शासकीय चिकित्सक

अभी भी अनेक ऐसे डॉक्टर हैं जो सिर्फ औपचारिकता के लिए शासकीय मेडिकल कॉलेज (GMC), एम सी एच (Mother & Child Hospital) और जिला चिकित्सालय में जाते हैं। वहाँ मुंह दिखाई करते हैं और अपने निजी प्रैक्टिस की और निकल जाते हैं। और तो और मरीजों को अपने निजी हॉस्पिटल के लिए रेफर कर बुलाते है। फिर वहीं पर उनका इलाज करते है। जिससे गरीबो पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है।

MCH (मदर एंड चाइल्ड हॉस्पिटल) में महिलाओं की प्रारंभिक जांच शासकीय चिकित्सालय में होती है, फिर दलालो के जरिये उन्हें निजी अस्पतालों का रास्ता दिखा कर वहा भेज दिया जाता है। यह एक आम सी बात है। और यह सब आला अधिकारियो के नाक के नीचे होता है। यदि आला अधिकारी सही जाँच कराएं तो आधे से ज्यादा चिकित्सक घर बैठ जायेंगे। लेकिन शायद वे सब काला चश्मा लगा कर बैठे हुए है, किसी को क्या फर्क पड़ता है? प्रश्न यह है कि क्या सब अपनी अपनी जेब भारी करने में लगे हुए है? ऐसा लगता है कि ‘भाड़ में जाये जनता – अपना काम बनता।’