News By – विवेक चौधरी
रतलाम। नगरीय निकाय चुनाव के मतदान के साथ ही महापौर और पार्षद प्रत्याशियों के भाग्य ईवीएम बक्से में कैद हो गए है। 13 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के दिन इंद्र देवता की परीक्षा के बावजूद रतलाम की जनता ने 70% मतदान कर अपने दायित्व का निर्वहन कर दिया है। यदि मतदाताओं के नाम सूची से गायब होने, एक परिवार के सदस्यों के मतदान केंद्र अलग अलग होने तथा पर्व एवं बारिश की दिक्कत आदि ना होती तो यह आंकड़ा 80% भी हो सकता था। बहरहाल अब विभिन्न वार्डो के मत प्रतिशत के आँकड़ो के अध्ययन एवं अटकलों का समय प्रारम्भ हो गया है कि कौन जीतेगा और किसकी फ़ाइल निपटेगी? किसकी नई शुरुआत होगी और किसकी पारी का अंत होगा?
चर्चा इस बात पर भी हो रही है कि यदि मयंक जाट की जीत होती है तो यह रतलाम सहित अन्य जगहों के लिए भी काँग्रेस के लिए एक बड़ा बदलाव हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही रतलाम शहर काँग्रेस की अंदरूनी राजनीति भी दिलचस्प हो जाएगी। पुराने नेता हाशिये पर जा सकते है और नए नेता का उदय एवं व्यक्तिगत छवि के आधार पर नई तरह की राजनीति का सूत्रपात हो सकता है। वहीं भाजपा में अगर प्रह्लाद पटेल जीतते है तो शहर विधायक चेतन्य काश्यप का पार्टी में कद और रतलाम भाजपा में वर्चस्व बढ़ जाएगा। विरोधियों और हारे हुए बागियों का भविष्य दिक्कत में आ सकता है। वहीं पटेल के हारने पर शहर विधायक के विरोधियों की जीत मानी जाएगी और शहर भाजपा में नए समीकरण तैयार हो सकते है।
लेकिन मतगणना तक सबकी साँसे हलक में अटकी हुई है। 70% मतदान का आँकड़ा नतीजो के पूर्वानुमान में फेरबदल कर सकता है। भाजपा के संगठन और पार्टी नेताओं के अंतिम समय में की गई मेहनत से “रतलामी चुनावी फ़ीवर का सिक्का तो खड़ा हो ही गया है।” कुछ दिनों पूर्व प्रदेश भाजपा ने सोशल मीडिया पर पूर्व मुख्यमंत्री एवं काँग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ का एक वीडियो जारी किया था जिसमें कमलनाथ अपने कार्यकर्ताओं को यह कह रहे थे कि “एक बात आपको याद रखनी है, आखरी के तीन दिन सबसे महत्वपूर्ण होते है। जब हम चुनाव हारते है, आखरी तीन दिन में चुनाव हार जाते है। तीन दिन में बीजेपी सबसे ज्यादा हावी होती है।” अब देखना यह होगा कि क्या कमलनाथ की चिंता सही साबित होगी या फिर उनके द्वारा चयनित मयंक जाट के रणनीतिकारों की योजना और मेहनत रंग लाएगी? या फिर प्रचार के अंतिम समय भाजपा का जोर लगाना क्या गेम चेंजर रहा? यह तो मतगणना के नतीजे ही बता पाएंगे।
भाजपा की संगठन शक्ति से कमलनाथ जी का डर अब खुल कर सामने आ रहा है।
ये डर अच्छा है! pic.twitter.com/cicQWPyL0v— BJP MadhyaPradesh (@BJP4MP) July 8, 2022
दावे तो दोनों और से किये जा रहे है, किए जाते ही है, लेकिन काफी समय बाद शहर ने काँटे वाला मुकाबला देखा, इस हलचल ने हर चौराहे, गली मोहल्ले में नया चुनावी रंग घोल दिया है। शहर की राजनीति के जानकर भी यह स्पष्ट नहीं कह पा रहे है कि विजेता कौन होगा? और उसके जीत का अंतर कितना होगा? नगर सरकार में किस पार्टी के कितने पार्षद होंगे? लेकिन संकेत इस बात के लग रहे है कि इस बार जीते हुए बागियों की परिषद गठन में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। यह लंबे समय तक याद रखा जाएगा कि प्रत्याशियों के नाम घोषणा के पूर्व एकतरफा नज़र आ रहा चुनाव कैसे अचानक से शेयर मार्केट के इंडेक्स जैसा हो गया। योजनाबद्ध तरीके से बनाई गई रणनीति और जनता की नब्ज को पकड़कर चुनावी मैनेजमेंट वाला प्रचार कैसे पासा पलटने की क्षमता रखता है, यह भविष्य में चुनाव लड़ने वालो के लिए सबक होगा। यह तो तय है कि यह चुनाव बदलाव का चुनाव है, लेकिन क्या यह बदलाव सत्ता में भी होगा या सत्ताधीशों के वर्चस्व में भी होगा? इस बात का जवाब तो 20 जुलाई को ही मिलेगा। तब तक “रतलामी चुनावी फ़ीवर” और उसकी चर्चाएं जारी रहेगी।
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