रतलाम, 14 सितंबर। क्षमापर्व की आराधना के लिए तीन स्टेप क्षमा रखो, क्षमा मांगों और क्षमा दे दो है। क्षमापना के दौरान यदि मन में किसी के प्रति बंधी बैर की गांठ को नहीं खोला,तो पर्यूषण पर्व के दौरान आपकी आराधना का कोई महत्व नहीं रहेगा।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने पर्यूषण महापर्व के दौरान गुरूवार को सैलाना वालों की हवेली मोहन टाकीज में “बैर की बिदाई, प्यार से सगाई” विषय पर प्रवचन में कही। आचार्य श्री ने कहा कि हमे अपने मन के भीतर बैर की गांठ को खोलना है और मन को कोमल, निर्मल बनाना है। एक बार अपनी गलतियों को स्वीकार करो और माफी मांग लो। मन में दुर्भावना की जड़ हो तो उसे उखाड़ फेंकना है और मन के बैर को खत्म करना है।

आचार्य श्री ने कहा कि जिस प्रकार से बिना अंक के शून्य की वैल्यू, बिना शकर के दूध की वैल्यू, बिना दूल्हे के बारात की वैल्यू और बिना नमक के सब्जी की कोई वैल्यू नहीं है, ठीक उसी तरह से बिना क्षमापना के पर्युषण पर्व में की गई आराधना की कोई वैल्यू नहीं है। अज्ञानता या प्रलोभन के कारण किसी के प्रति आपके मन में बैर की गांठ बन गई है तो उसे खत्म करना है। फिर वह चाहे भाई-भाई, सास-बहू, देरानी-जेठानी या पिता-पुत्र ही क्यो न हो। हमें माफी मांगकर बैर की इस गांठ को खोलना है।
आचार्य श्री ने कहा कि मन को कंट्रोल में रखो, आउट आफ कंट्रोल नहीं। क्रोध में बुद्धि और विवेक खत्म हो जाता है, इसलिए हमें क्रोध में भी शांत रहना है। मानव स्वभाव होता है, वह हमेशा अपने से छोटे पर ही क्रोध करता है। यदि क्रोध आए तब भी अच्छे शब्दों का प्रयोग करो। यदि एक बोले तो दूसरे को अपने आप चुप हो जाना चाहिए। इससे बात आगे नहीं बढ़ती और बेर भी नहीं होता | प्रवचन में श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय एवं श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के पदाधिकारी, सदस्य एवं बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।



