News by – विवेक चौधरी
रतलाम। प्रदेश की अन्य जगहों के साथ साथ अब रतलाम जिले पर भी “चुनावी फ़ीवर” का रंग दिखने लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रतलाम में सभा के बाद क्षेत्र में भाजपा के कार्यकर्ताओं में भरपूर उत्साह नज़र आ रहा है। प्रधानमंत्री इस बार विधानसभा चुनाव में रतलाम आए जबकि अपने विगत दो प्रवास में वे लोकसभा के प्रचार में आए थे। एक बार गुजरात के मुख्यमंत्री थे और दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में। मंच से उन्होंने रतलामी सेव के स्वाद की बात कही और क्षेत्र में “चुनावी फ़ीवर” को मसालेदार बना दिया। वहीं प्रधानमंत्री के प्रवास के अगले दिन ही प्रदेश में 10 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे काँग्रेस के बड़े नेता दिग्विजय सिंह के आगमन से काँग्रेस के कार्यकर्ताओं में भी उत्साह का संचार हुआ है। दिग्विजय सिंह का अपना अलग प्रभाव है और कार्यकर्ताओं में पकड़ भी है। उनके अनुभव का लाभ काँग्रेस को मिल सकता है।
भाजपा को है “भैयाजी पर भरोसा”
अगर रतलाम शहर सीट के “चुनावी फ़ीवर” की बात करें तो भाजपा को अपने “भैयाजी” पर पूरा भरोसा है। उनके कार्यकर्ता “अबकी बार छप्पन पार” का नारा लगा रहें है। भाजपा प्रत्याशी चेतन्य कश्यप लगातार 2 बार रतलाम शहर से भाजपा विधायक के रूप में चुने गए हैं। पिछली बार भी 40 हजार से अधिक मतों से जीतें थे और उनके कार्यकाल में हुए शहर के विकास पर उनका और उनकी पार्टी को पूरा भरोसा है। पार्टी ने भी उन पर भरोसा दिखाते हुए उन्हें तीसरी बार अपना प्रत्याशी घोषित किया है। यद्धपि पार्टी में भीतरी छोटी मोटी नाराज़गी भी है और वो अन्य जगहों की भांति यहाँ भी दिख रही है लेकिन रतलाम शहर में सीधा मुकाबला होने से “भाजपा के भैयाजी” को कोई दिक्कत नज़र नहीं आ रही है। उन्होंने पहले से ही योजनाबद्ध रूप में अपने प्रचार प्रसार का बंदोबस्त कर दिया था, जिससे उन्हें राह आसान नज़र आ रही है। कॉरपोरेट शैली में काम करने का उनका अंदाज़ उनकी विशेषता रहा है।
काँग्रेस के “दादा को बेटे का सहारा”
वहीं दूसरी ओर रतलाम में मौजूदा भाजपा विधायक को काँग्रेस के प्रत्याशी पारस सकलेचा टक्कर दे रहें है। सकलेचा लोगों में पारस “दादा” के नाम से लोकप्रिय है। उन्हें युवाम के माध्यम से रोज़गार से जुड़े युवाओं एवं परिवारों के साथ की पूरी उम्मीद है। उनके साथ प्रचार प्रसार में मयंक जाट का विशेष योगदान दिख रहा है, जिन्हें “रतलाम का बेटा” कहा जा रहा है। कार्यकर्ताओं के द्वारा यही दावा किया जा रहा है कि जनता द्वारा “रतलाम के बेटे” को आशीर्वाद मिल रहा है। यद्धपि काँग्रेस के ओर से प्रत्याशी के लिए मयंक जाट प्रबलतम दावेदार थे लेकिन एक कानूनी उलझन के चलते वे चुनाव मैदान में नहीं उतरे। जानकारों का कहना है कि यह पहले से ही तय था कि अगर मयंक जाट चुनाव नहीं लड़ते है तो पारस दादा ही चुनाव लड़ेंगे क्योंकि शहर में बड़ी संख्या में जैन मतदाता है और भाजपा के उम्मीदवार भी जैन समुदाय से आते है। काँग्रेस ने एक सनातनी और एक अल्पसंख्यक दावेवार को टिकिट ना देते हुए पारस दादा को उम्मीदवार बनाया। पारस दादा की लोकप्रियता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि वे पूर्व में रतलाम शहर में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में महापौर और फिर विधायक के चुने गए थे। लेकिन भाजपा दिग्गज हिम्मत कोठारी की याचिका पर “दादा” की विधायकी शून्य घोषित कर दी गई। इसके बाद उनकी लोकप्रियता में कमी आई है इसलिए “दादा” को “शहर के बेटे” पर पूरा भरोसा है कि उनकी मदद से बदलाव का चमत्कार हो जाये।




